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श्री सूक्त




वर्ण सुवर्ण समुज्जवल जिनका जो हरती जन के दूषण ।
जिनके अंग विभूषित करते स्वर्ण रजत के आभूषण।।
जिनकी शुभदायक शुभशोभा करती जन का आकर्षण ।
मुझे कराओ अनल उन्हीं श्री का दर्शन संताप हरण।।1।।


तुम मेरे कल्याण हेतु ले आओ उनको देव अनल ।
फिर सदैव के लिये लक्ष्मी य हां विराजे हुर्इ अचल।।
उनके शुभागमन से मुझको मिले सोख्य सम्पतित अतुल।
अश्व धेनु सुत और सेवकों सहित समुन्नत होवे कुल।।2।।


जुते हुऐ सुन्दर घोडों से़ रथ के बीच सुशोभित आाप ।
हसितनाद से हुर्इ प्रफुलिलत मिटा रही भीषण भवताप ।।
महिमामयी रमा श्री माता कर दो करुणा का चितवन ।
श्रद्धा से करता हूं सादर देवी आपका आव्हान ।।3।।


मंद मंद मुस्कान लिये जो बरसाती आनन्द अमन्द ।
स्वर्ण जडि़त पलकों में जो दया द्रवित रहती निद्वर् न्द ।।
पदमवर्ण पदमों पर शोभितजिनका ज्योति स्वरुप वदन।
श्रध्दा से मैं करता ऐसी श्री का सादर आव्हान ।।4।।


चन्द्र सरिस आनन्द दायिनी दिव्य कांति य श का भंड़ार ।
इन्द्र आदि सुर वृंद वंदिता कोमल वंदन परम उदार ।।
कमलासन परशोभित मां की लेता हुं सानन्द शरण ।
देवी मिटा दो दु:ख दरिद्रता,करता हुं मैं आराधन ।ं।5।।


सुर्य वर्ण वाली मां तुमने तबसे दिया वनस्पति एक ।
उससे हुआ बेल जिसका हरे दरिद्रता दे सुविवेक ।।
हे माता कुबेर सम्पतित य श लेकर आवे मेरे पास ।
दिव्य देश में जन्मा हूं मैं मुझे मिले बल बुद्धि विकास ।।6।।


भूख प्यास पीड़ा मलीनता और अलक्ष्मी का हो नाश ।
दु:ख दरिद्रता और दासता हर के कर दो देव प्रकाश ।।
जिनका दर्श होता करके वन्दन पु़श्पों से पुजन ।
नित्य पुष्ट जो जिन्हें न कोर्इ दबा सका है संघर्षण ।।7।।


भोजन व द्र्धक जीव चराचर पर जो करती हैं शासन ।
मैं श्रद्धा से करता ऐसी श्री का सादर आव्हान ।।8।।


सिद्ध मनोरथ,सत्य वचन हो,हो मेरे संकल्प सफल ।
गौ गज पशु धनधान्य वृद्धि हो,मिले कीर्ति ऐश्वर्य प्रबल ।।9।।


ब्रहम पुत्र कर्दम तुमसे ही है सारा जग उत्पन्न ।
है कर्दम तुम मेरे घर में वास करो होकर सम्पन्न ।।
शुभ कमलों की मंजुल माला वाली मां को लाओ साथ ।
उन्हें बसाओ मेरे कुल में सिर पर धरे दया का हाथ।10।।


मेरे घर में सिनग्ध वस्तुओं की जल देव करे उत्पन्न ।
मां को य हां बसाओ मुनिवर तुम भी आओ हुऐ प्रसन्न ।।
तुम मेरे कल्याण हेतु ले आओ उनको देव अनल ।
परम उदार हृदय श्रीमाता , लिये हाथ में मंजु कमल।।11।।

सोने के गहन पहिने जो भक्त सहायक होती नित्य ।
स्वर्ण वर्ण जिनका प्रकाश है , दीपितमान जैसे आदित्य 12।।


तुम मेरे कल्याण हेतु ले आओ उनको देव अनल ।
स्वर्ण वर्ण श्री लक्ष्मी मां की जो है दया मर्ूर्ति र्निमल ।।
पहिने पदमो की प्रिय माला जो करती जग का पालन ।
स्वर्ण वर्ण मा करती जो भक्त जनेां का मनरंजन ।।13।।


तुम मेरे कल्याण हेतु ले आओ उनको देव अनल ।
फिर सदैव के लिये लक्ष्मी य हां विराजी हुर्इ अचल ।।
उनके शुभागमन से मुझको मिले सौख्य सम्पति अतुल।
अश्व धेनु सुत और सेवकों सहित समुन्नत होवेकुल।।14।।


जो जन धन करे कामना सावधान हो करे हवन ।
ये पंद्रह श्री सूक्त रिचायें पढें नित्य होकर पावन ।।15।।



संग्रहित कर्ता
पंडि़त के.बी.मिश्रा