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नवग्रह से जानिए शरीर के रोग
ज्योतिष विज्ञान को मानने वाले वैदिक शोधकर्ताओं का मानना है कि ज्योतिष के अनुसार व्यक्ति के शरीर का संचालन भी ग्रहों के अनुसार होता है।
सूर्य- आंखें,
चंद्रमा- मन,
मंगल- रक्त संचार,
बुध- हृदय,
बृहस्पति- बुद्धि,
शुक्र- प्रत्येक रस तथा
शनि,राहु और केतु- उदर का स्वामी है।

शनि अगर बलवान है तो नौकरी और व्यापार में विशेष लाभ होता है। गृहस्थ जीवन सुचारू चलता है। लेकिन अगर शनि का प्रकोप है तो व्यक्ति को बात-बात पर क्रोध आता है। निर्णय शक्ति काम नहीं करती, गृहस्थी में कलह और व्यापार में तबाही होती है। नौ ग्रह और उनका फल :- ग्रहों की स्थितिनुसार मिलता है फल
आकाश मण्डल में यूँ तो अनेक ग्रह है लेकिन सात ग्रह व दो छाया ग्रहों का ही महत्व हमारे ज्योतिष शास्त्र में मिलता है।
अचूक उपाय

हम सभी जानते है की कुंडली कुल बारह भाव होते है सभी भावे के अलग-अलग स्वामी होते है … किस भाव में कौन सा गृह ख़राब है , और उसका उपाय कैसे करें.

जिस ग्रह से संबंधित वस्तुृओं को....


सूर्य चन्द्र मंगल बुध
बृहस्पति शुक्र शनि
राहू केतू

प्रत्येक जातक की कुंडली में अशुभ ग्रहों की स्थिति अलग-अलग रहती है, परंतु कुछ कर्मों के आधार पर भी ग्रह आपको अशुभ फल देते हैं। व्यक्ति के कर्म-कुकर्म के द्वारा किस प्रकार नवग्रह के अशुभ फल प्राप्त होते हैं, आइए जानते हैं :


सूर्य :

किसी का दिल दुखाने (कष्ट देने), किसी भी प्रकार का टैक्स चोरी करने एवं किसी भी जीव की आत्मा को ठेस पहुँचाने पर सूर्य अशुभ फल देता है।


सिंह के मंगल का बारह राशियों पर प्रभाव :-
मेष राशि वृषभ राशि मिथुन राशि कर्क राशि सिंह राशि कन्या राशि तुला राशि वृश्चिक राशि धनु राशि मकर राशि कुंभ राशि मीन राशि

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- मेष राशि वालों का स्वामी मंगल है उसका गोचर भ्रमण पंचम से होगा। पंचम स्थान संतान, विद्या, मनोरंजन, प्रेम से संबंध रखता है। इन सब पर मंगल की कृपा रहने से शुभत्व रहेगा। वहीं गुरु की भी दृष्टि पड़ने से वक्री के समय अशुभ प्रभाव से बचाएगा। गुरु मेष राशि पर है अतः भावेश-भावाम: के तहत मंगल ने दोहरा प्रभाव गुरु का ग्रहण किया है, इस प्रकार देखा जाए तो मंगल का अशुभ प्रभाव निष्क्रिय रहेगा।

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- वृषभ राशि वालों के लिए मंगल द्वादशेश व सप्तमेश होकर चतुर्थ भाव माता, भूमि, भवन, जनता से संबंधित मामलों में सुधार लाएगा।

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- मिथुन राशि वालों के लिए एकादशेश व षष्टेश होकर पराक्रम भाव तृतीय से भ्रमण करने से पराक्रम द्वारा सफलता के नए सोपान देगा। छोटे भाईयों से मदद मिलेगी वहीं मित्र भी साथ देंगे। भाग्य पर विपरीत प्रभाव डालेगा क्योंकि वहां कुंभ राशि है, लेकिन दशम भाव पर शुभ फलदायी रहेगा वहां गुरु की राशि मीन है।

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- कर्क राशि वालों के लिए मंगल पंचमेश व दशमेश होकर द्वितीय भाव (धन) से गोचरीय भ्रमण करने से वाणी द्वारा सफलतादायक होगा, कुटुंब से सहयोग भी रहेगा। आयु पर संकट डालेगा लेकिन गुरु का मंगल पर अधिकार होने से प्रभावहीन होगा। भाग्य पर मित्र-दृष्टि डालने से भाग्य में वृद्धि का कारक रहेगा। वक्री स्थिति में गुरु का साथ होने से मंगल प्रभावशाली न होकर शांत रहेगा।

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- सिंह राशि वालों के लिए मंगल चतुर्थ व नवम (भाग्य-सुख) का स्वामी होकर लग्न से भ्रमण करने से इन दोनों को प्रभावशाली बनाएगा। रूके कार्य पूरे करने में सहयोगी होगा। गुरु का भाग्य से भ्रमण करने व मंगल पर पंचम दृष्टि होने से गुरु का प्रभाव रहेगा। वक्री होने पर भी अशुभ नहीं होगा।

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- कन्या राशि वालों के लिए मंगल तृतीयेश व अष्टमेश होकर द्वादश भाव से भ्रमण करने से मंगल का शुभ परिणाम नहीं मिलेगा अशुभता को बढ़ाने वाला होगा। बाहरी मामलों में थोड़ा सहायक होगा।

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- तुला राशि वालों के लिए मंगल सप्तमेश व द्वितीयेश होने के कारण दांपत्य जीवन पर मिला-जुला असर डालेगा। वहीं गुरु की कृपा से अशुभता में कमी आएगी।

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- वृश्चिक राशि वालों के लिए लग्न व षष्ट भाव का स्वामी होकर दशम भाव से गोचर भ्रमण करने से व्यापार-व्यवसाय में वृद्धि कारक रहेगा। नौकरीपेशा व्यक्तियों के लिए भी लाभकारी रहेगा। वक्री स्थिति में गुरु की दृष्टि मंगल पर होने से राहत देगा।

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- धनु राशि वालों के लिए द्वादशेश व पंचमेश होकर भाग्य से भ्रमण करने से भाग्य में वृद्धि के साथ धर्म-कर्म में आस्था का संचार करेगा। कई महत्वपूर्ण कार्य में सफलताकारक होगा। वक्री ग्रह मेहनत अधिक कराता है लेकिन फल शुभ ही देता है।

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- मकर राशि वालों के लिए मंगल चतुर्थ व एकादश भाव का स्वामी होकर अष्टम भाव से गोचर भ्रमण करने से शुभ फल न देकर अशुभ परिणाम देनेवाला होगा। अष्टम से गोचर भ्रमण ठीक नहीं होता। माता को कष्ट, मकान भूमि से हानि, जनता के बीच अपयश मिलता है। गुरु का गोचर भ्रमण सुख व माता के कष्टों में कमी लाएगा।

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- कुंभ राशि वालों के लिए तृतीयेश व दशमेश होकर सप्तम भाव से गोचर भ्रमण करने से दांपत्य जीवन में मिली-जुली स्थिति का कारक होगा, दैनिक व्यापार-व्यवसाय में भी राहत का कारण बनेगा।

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- मीन राशि वालों के लिए मंगल धन द्वितीय व भाग्य का स्वामी होकर षष्ट भाव से भ्रमण करने से कुटुंब से परेशानी का कारण बन सकता है। आर्थिक बचत कम होगी, भाग्येश पर स्वदृष्टि होने से राहत भी देगा। मंगल का अशुभ परिणाम तभी मिलेगा जब जन्म के समय अशुभ स्थान पर हो व उसकी दशा-अंतर्दशा चल रही हो। गुरु की मंगल पर पंचम दृष्टि पड़ने से मंगल का अशुभ प्रभाव कम ही रहेगा।

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चंद्र :

सम्मानजनक स्त्रियों को कष्ट देने जैसे, माता, नानी, दादी, सास एवं इनके पद के समान वाली स्त्रियों को कष्ट देने एवं किसी से द्वेषपूर्वक ली वस्तु के कारण चंद्रमा अशुभ फल देता है।

जानिए चंद्र देव को... सोमवार के स्वामी हैं चंद्र देव

* सोम के रूप में वे सोमवार के स्वामी हैं।
* वे सत्व गुण वाले हैं और मन, माता की रानी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* चंद्र को सोम के रूप में जाना जाता है और उन्हें वैदिक चंद्र देवता सोम के साथ पहचाना जाता है।
* उन्हें जवान, सुंदर, गौर, द्विबाहु के रूप में वर्णित किया गया है।
* उनके हाथों में एक मुगदर और एक कमल रहता है।
* वे हर रात पूरे आकाश में अपना रथ (चांद) चलाते हैं, जिसे दस सफेद घोड़े या मृग द्वारा खींचा जाता है।

मेष राशि वृषभ राशि मिथुन राशि कर्क राशि सिंह राशि कन्या राशि तुला राशि वृश्चिक राशि धनु राशि मकर राशि कुंभ राशि मीन राशि

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लग्न में चंद्रमा हो तो जातक बलवान, ऐश्वर्यशाली, सुखी, व्यवसायी, गायन-वाद्य प्रिय एवं स्थूल शरीर होता है।
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दूसरे भाव में चंद्र हो तो मधुरभाषी, सुंदर, भोगी, परदेशवासी, सहनशील एवं शांति प्रिय होता है।
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तीसरे भाव में चंद्र हो तो पराक्रम से धन प्राप्ति, धार्मिक, यशस्वी, प्रसन्न, आस्तिक एवं मधुरभाषी होता है।
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चौथे भाव में हो तो दानी, मानी, सुखी, उदार, रोगरहित, विवाह के पश्चात कन्या संततिवान, सदाचारी, सट्टे से धन कमाने वाला एवं क्षमाशील होता है।
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पांचवें भाव में चंद्र हो तो शुद्ध बुद्धि, चंचल, सदाचारी, क्षमावान तथा शौकीन होता है।
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छठे भाव में चंद्रमा होने से कफ रोगी, नेत्र रोगी, अल्पायु, आसक्त, व्ययी होता है।
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चंद्रमा सातवें स्थान में होने से सभ्य, धैर्यवान, नेता, विचारक, प्रवासी, जलयात्रा करने वाला, अभिमानी, व्यापारी, वकील एवं स्फूर्तिवान होता है।
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आठवें भाव में चंद्रमा होने से विकारग्रस्त, कामी, व्यापार से लाभ वाला, वाचाल, स्वाभिमानी, बंधन से दुखी होने वाला एवं ईर्ष्यालु होता है।
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नौंवे भाव में चंद्रमा होने से जातक संतति, संपत्तिवान, धर्मात्मा, कार्यशील, प्रवास प्रिय, न्यायी, विद्वान एवं साहसी होता है।
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दसवें भाव में चंद्रमा होने से कार्यकुशल, दयालु, निर्मल बुद्धि, व्यापारी, यशस्वी, संतोषी एवं लोकहितैषी होता है।
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ग्यारहवें भाव में चंद्रमा होने से चंचल बुद्धि, गुणी, संतति एवं संपत्ति से युक्त, यशस्वी, दीर्घायु, परदेशप्रिय एवं राज्यकार्य में दक्ष होता है।
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बारहवें भाव में चंद्रमा होने से नेत्र रोगी, कफ रोगी, क्रोधी, एकांत प्रिय, चिंतनशील, मृदुभाषी एवं अधिक व्यय करने वाला होता है।
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मंगल :

भाई से झगड़ा करने, भाई के साथ धोखा करने से मंगल के अशुभ फल शुरू हो जाते हैं। इसी के साथ अपनी पत्नी के भाई (साले) का अपमान करने पर भी मंगल अशुभ फल देता है।

मंगल की उच्च राशि मकर है और कर्क नीच राशि है। मेष व वृश्चिक स्वराशि है तथा सिंह, धनु व मीन से इसकी मित्रता है। मंगल बुध से समभाव रखता है व इसकी शत्रुता शुक्र की राशि वृषभ, तुला व कुंभ से है। इन राशियों पर मंगल की दृष्टि बुरा असर डालती है।
मेष राशि वृषभ राशि मिथुन राशि कर्क राशि सिंह राशि कन्या राशि तुला राशि वृश्चिक राशि धनु राशि मकर राशि कुंभ राशि मीन राशि

यह हैं मंगल के रिश्ते : -

पहला घर - भाई।
दूसरा घर - बड़ा भाई।
तीसरा घर - ताऊ।
चौथा घर - मामा।
पांचवां घर - ‍मित्र।
छठा घर - बहनोई (जीजा) ।
सातवां घर- भाई या साला।
आठवां घर- छोटे भाइयों के लिए दुष्ट भाई।
नौवां घर- दादा का भाई (बाबा)।
दसवां घर- पिता का धर्म भाई।
ग्यारहवां घर- ‍पिता का दिखावी भाई।
बारहवां घर- बड़े भाई के खून का प्यासा भाई।

मंगल की वस्तुएं : -

पहला घर - दांत, सफेद अनाज की रोटी।
दूसरा घर - चिंता, मृग।
तीसरा घर - पेट, होंठ, छाती।
चौथा घर - तलवार, डेक का वृक्ष।
पांचवां घर - भाई, नीम का वृक्ष।
छठा घर - नाभि, छछून्दर।
सातवां घर- वृक्ष, फलदार पौधे, बेलें, लताएं।
आठवां घर- ‍िबना बांहों का शरीर।
नौवां घर- लाल रंग (रक्तिम)।
दसवां घर- देशी खांड, शहद, मीठा भोजन।
ग्यारहवां घर- लाल रंग का सिंदूर।
बारहवां घर- ऊंची आवाज।


मंगल ग्रह से साहस, ऊर्जा, शक्ति, गुस्सा, रक्त, पराक्रम, आक्रामक शैली, युद्ध, राजयोग, शत्रु, लाल रंग, हानि, गर्मी, राजसेवा, रोग, प्रसिद्धि, हड्डी, युवावस्था, भाई, वन क्षेत्र, पुलिस-सेना, आई.पी.एस., मूत्र रोग, ठेकेदार, अग्नि, आग से जलना, मकान-भूमी, रक्त व इससे संबंधित रोग, माँस-भक्षण, दण्डाधिकारी, पारा, कृषि-भूमि, सोना, ताँबा, भोजन, गंभीरता, वाहन-सुख आदि देखा जाता है।

मेष लग्न हो तो मंगल लग्नेश व अष्टम भाव का स्वामी होगा। इस लग्न में मंगल चतुर्थ भाव में नीच राशि कर्क में होने उपरोक्त कारक तत्वों में कमी लाएगा। स्वास्थ्य पर भी विपरित असर पड़ेगा, चोट भी लग सकती है। दुर्घटना के योग भी बन सकते हैं।
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वृषभ लग्न में मंगल द्वादशेश व सप्तम भाव का स्वामी होगा। द्वादश भाव बाहरी संबंध, विदेश यात्रा, भोग विलास, बाई आँख व सप्तम दाम्पत्य जीवन, सेक्स, विवाह संबंध, दैनिक व्यवसाय, स्त्री से संबंधित भाव को बिगाड़ता है। इसमें मंगल नीच का तृतीय भाव में होगा।
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मिथुन लग्न में मंगल एकादशेश व षष्टेश होगा। एकादश आय भाव शेयर बाजार से जुड़े व्यक्ति को क्षति पहुँचाएगा, षष्टेश होने से शत्रुओं में, कर्ज वृद्धि का कारण बनता है।
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कर्क लग्न में दशम व पंचम भाव का स्वामी होगा। दशम पिता, राज्य, नौकरी, व्यापार, राजनीति के क्षेत्र में बाधा का कारण बनता है। वही संतान, विद्या, मनोरंजन, प्रेम संबंधों में भी क्षति का कारण बनता है। मंगल लग्न में ही नीच का होगा।
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सिंह लग्न में मंगल नवम व चतुर्थ भाव का स्वामी होगा। भाग्येश होने से धर्म-कर्म में कमी, भाग्य में अवरोध, यश में कमी का कारण बनता है। चतुर्थेश होने से सुख में कमी, माता से अनबन, मकान की परेशानी का कारण बनता है। स्थानीय राजनीति में भी नुकसानप्रद होता है। इस लग्न में मंगल द्वादशेश में नीच का होगा।
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कन्या लग्न में मंगल अष्टम व तृतीयेश होगा। अष्टम, आयु, गुप्त रोग, गुप्त धन में क्षति का कारण बनता है। वहीं तृतीयेश होने से भाई से विरोध या भाई का न होना, मित्र से गड़बड़, साझेदार से परेशानी, पड़ोसी से अनबन का कारण बनता है। इस लग्न में मंगल एकादश भाव में नीच का होगा।
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तुला लग्न में सप्तम व द्वितीय भाव का स्वामी होगा। सप्तम भाव दाम्पत्य जीवन, सेक्स, मारक भाव, दैनिक व्यवसाय इनमें नुकसानदायक रहेगा। द्वितीय होने से धन, कुटुंब, वाणी, दाईं आँख, बचत में कमी की कारण बनता है। इसमें मंगल दशम भाव में नीच का होगा।
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वृश्चिक लग्न में लग्नेश व षष्ट भाव का स्वामी होगा। लग्नेश होने से साहस में कमी, काम में मन न लगना, चिड़चिड़ापन रहना यह कारण बनते है। षष्टेश होने से नाना, मामा का घर बिगाड़ता है वही कर्जदार भी बनाता है। शत्रुओं से परेशानी का कारण भी बनता है। इस लग्न में मंगल नवम भाव में नीच का होगा।
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धनु लग्न में मंगल पंचम व द्वादश भाव का स्वामी होगा। पंचम होने से विद्या में रूकावट, संतान बाधा का कारण बनता है, वहीं विदेश यात्रा में बाधा, पढा़ई आदि में रूकावट आती है। इस भाव में मंगल अष्टम में नीच का होगा।
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मकर लग्न में मंगल चतुर्थ व एकादश भाव का स्वामी होगा। यह आय के क्षेत्र में व माता, भूमि-मकान से संबंधित मामलों में रूकावट डालेगा। इस लग्न में मंगल सप्तम भाव में नीच का होगा।
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कुंभ लग्न में मंगल तृतीय व दशम भाव का स्वामी होगा। साझेदारी, शत्रु, भाई से बाधा का कारण बनता है। लाभ के मामलों में भी रूकावट पैदा करेगा। इस लग्न में मंगल षष्ट भाव में नीच का होगा।
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मीन लग्न में मंगल द्वितीय व नवम भाव का स्वामी होगा। यह वाणी को कठोर बनाता है व काम बिगाड़ता है। कुटुंब से नहीं बनने देता है। भाग्य में रूकावट का सामना करना पड़ता है। धर्म-कर्म में भी मन नहीं लगता।

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मंगल पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव भी खराब होता है। मंगल के अशुभ प्रभाव मिल रहे हो तो मंगल से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए। जैसे- खड़े मसूर, गुड, ताँबा, लाल वस्तु आदि व किसी विद्वान को जन्म पत्रिका दिखाकर शुभ मुहूर्त में मूँगा धारण करें।

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बुध :

अपनी बहन अथवा बेटी को कष्ट देने एवं बुआ को कष्ट देने, साली एवं मौसी को कष्ट देने से बुध अशुभ फल देता है। इसी के साथ हिजड़े को कष्ट देने पर भी बुध अशुभ फल देता है।


बुध चंद्रमा के पुत्र हैं। उनकी माता का नाम रोहिणी हैं। उन्हें विद्वान और अथर्ववेद के ज्ञाता माना जाता है। उनका विवाह वैवस्वत मनु की पुत्री इला से हुआ। देवों की सभा में बुध को राजकुमार कहा गया है।

शुभ : बहन, मौसी और बुआ की स्थिति ठीक रहती है। सुंदर देह वाला ऐसा व्यक्ति ज्ञानी और चतुर होता है। सोच-समझ कर बोलता है। उसकी बातों का असर होता है। ईमानदारी छोड़ दे तो शुभ प्रभाव छोड़ देता है। सूंघने की शक्ति गजब की होती है। व्यापार और नौकरी में किसी भी प्रकार की अड़चन नहीं आती है।
अशुभ : सूंघने की शक्ति क्षीण हो जाती है। समय पूर्व ही दांतों का खराब होना। मित्र से संबंधों का बिगड़ना। तुतलाहट। अशुभ हो तो बहन, बुआ और मौसी पर विपत्ति बनी रहती है। केतु और मंगल के साथ मंदा फल। शत्रु ग्रहों से ग्रसित बुध का फल मंदा ही रहता है।
विशेषत: यह नौकरी या व्यापार में नुकसान दे सकता है। संभोग की शक्ति क्षीण कर देता है।
उपाय : दुर्गा की भक्ति। नाक छिदवाना। बेटी, बहन, बुआ और साली से अच्छे संबंध रखें। बुधवार के दिन गाय को हरा चारा खिलाना। साबूत हरे मूंग का दान करना। झूठ न बोलना।
मकान : बुध के मकान के चारों ओर खाली जगह होती है। हो सकता है कि यह मकान सभी मकानों से अलग अकेला ही हो। मकान के साथ चौड़े पत्तों के वृक्ष होंगे। गुरु और चंद्र के वृक्ष के साथ न होगा और अगर हुआ तो वह घर बुध की दुश्मनी का पुख्ता प्रमाण माना जाएगा।
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मेष राशि वृषभ राशि मिथुन राशि कर्क राशि सिंह राशि कन्या राशि तुला राशि वृश्चिक राशि धनु राशि मकर राशि कुंभ राशि मीन राशि
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  • देवता: दुर्गा
  • दिवस : बुधवार
  • वाहन : सिंह
  • भाव : बारहवें स्थान के स्वामी
  • गोत्र व जाति : अत्रि गोत्र, चंद्रवंशी
  • पेशा : दलाल या व्यापारी
  • विशेषता : चापलुसी
  • शक्ति : बोलना, लोगों में दबदबा रखना
  • गुण : दिमागी कसरत, बोलना, मित्रता
  • धातु : हीरा और पन्ना
  • वर्ण : बुध का रंग श्याम है और इनकी 18 किरणें हैं।
  • शरीर के अंग : दिमाग का ढांचा, जीभ, दांत, नाड़ियां, नाक का सिरा
  • वस्त्र : टोपी, नाड़ा, तगारी, पेटी
  • पशु : बकरा, बकरी, भेड़, चमगादड़
  • वृक्ष : केला, चौड़े पत्ते के पौधे
  • नक्षत्र : आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती
  • भ्रमण : बुध 25 दिन तक एक राशि में निवास करते हैं। ग्रहों में इन्हें युवराज कहा गया है। इनमें पृथ्वी तथा वायु दोनों तत्व मौजूद है।
  • दिशा : पूर्व दिशा
  • बल : शुक्र और बुध दोनों ही एक ही भाव में हो तो बुध बलशाली।
  • अन्य नाम : चंद्र पुत्र, बोधन, सौम्य, शांत, शशिसुत, हेम्प और उतारुद।
  • स्वभाव : अति चतुर और हास्य प्रधान। स्त्रेण और नपुंसक दोनों तत्व मौजूद। शुभ हो तो जवानी का भरपूर जोश।
  • राशि : कन्या और मिथुन राशि के स्वामी बुध के सूर्य़, शुक्र और राहु मित्र, चंद्र शत्रु और मंगल, गुरु, शनि और केतु सम।
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बुध लग्न में हो तो वह अपने पूरे जीवन को व्यवस्थित करता हुआ उन्नति की ओर अग्रसर होता है। उसकी बुद्धि श्रेष्ठ होती है। उसका शरीर स्वर्ण के समान कांतिवाला और वह प्रसन्नचित्त प्राणी होता है। ऐसा व्यक्ति दीर्घायु, गणितज्ञ, विनोदी, उदार व मितभाषी होता है।
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दूसरे भाव में हो तो वह बुद्धिमान तथा परिश्रमी होता है। सभा आदि में भाषण द्वारा वह जनता को मंत्रमुग्ध कर सकता है।
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तीसरे भाव में हो तब ऐसा व्यक्ति व्यापारी से मित्रता स्थापित करने वाला होता है। व्यापारादि कार्यों में उसकी बहुत रुचि होती है।
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चौथे भाव में हो तो व्यक्ति बुद्धिमान होता है। राज्य में उसकी प्रतिष्ठा तथा मित्रों से सम्मान होता है।
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पांचवे भाव में हो तो उसे संतान सुख का अभाव रहता है। यदि होता भी है तो वृद्धावस्था में पुत्र लाभ प्राप्त होता है।
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छठे भाव में हो तो उसका अन्य मनुष्यों के साथ विरोध रहता है।
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सातवें भाव में हो तो वह स्त्री के लिए सुखदायक ‍होता है।
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आठवें भाव में हो तो उस व्यक्ति की उम्र लंबी होती है। यह देश-विदेश में भी ख्याति लाभ दिलाता है।
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नौवें भाव में हो तो मनुष्य धार्मिक कार्यों में रुचि लेने वाला, बुद्धिमान, तीर्थ आदि करने वाला होता है। तथा घर का कुलदीपक भी होता हैं।
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दसवें भाव में हो तो ऐसा जातक पिता द्वारा अर्जित धन प्राप्त करता है।
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ग्यारहवें भाव में हो तो वह व्यक्ति को बहुत सारी संपत्ति का मालिक बनाता है। ऐसा व्यक्ति लेखक या कवि भी होता है।
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बारहवें भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति विद्वान होते हुए भी आलसी होता है।
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गुरु :

अपने पिता, दादा, नाना को कष्ट देने अथवा इनके समान सम्मानित व्यक्ति को कष्ट देने एवं साधु संतों को कष्ट देने से गुरु अशुभ फल देता है।
* बृहस्पति (Jupiter), देवताओं के गुरु हैं।
* गुरु शील और धर्म के अवतार हैं।
* प्रार्थनाओं और बलिदानों के मुख्य प्रस्तावक हैं, जिन्हें देवताओं के पुरोहित के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
* बृहस्पति सत्व गुणी हैं और ज्ञान और शिक्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं।
* हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, वे देवताओं के गुरु हैं और दानवों के गुरु शुक्राचार्य के कट्टर विरोधी हैं।
* बृहस्पति पीले या सुनहरे रंग के हैं और एक छड़ी, एक कमल और अपनी माला धारण करते हैं।

मेष राशि वृषभ राशि मिथुन राशि कर्क राशि सिंह राशि कन्या राशि तुला राशि वृश्चिक राशि धनु राशि मकर राशि कुंभ राशि मीन राशि

मेष राशि- (चू, चे, लो, ला, ली, लू, ले, अ): इस राशि वालों को देवगुरु बृहस्पति धार्मिक कार्यों में लगाए रखेंगे लेकिन शरीर में थकावट तथा उदासीनता का योग बना रहेगा। कमजोरी के कारण रूग्णता बढ़ेगी। स्वास्थ्य सुधार हेतु शिव पूजा करें। पत्नी की सेवा से शुभ लाभ बनेगा, लेकिन शारीरिक रूप से दूरी बनाए रखें। आर्थिक दृष्टि से माह चिन्तादायक रहेगा। मान-सम्मान में भी न्यूनता बनेगी। विवादित मामलों से बचें। देश-विदेश यात्रा के नाम पर धोखा हो सकता है। 14, 21 तारीखें शुभदायक नहीं हैं अतः सावधानी बरतें।
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वृषभ राशि- (ई, उ, ए, ओ, वा, वि, वू, बे, बो) : गुरु बृहस्पति परीक्षा एवं प्रतियोगिताओं में सफलता का योग बना रहे हैं। रोजगार प्राप्ति का शुभ अवसर मिलेगा। संतान पक्ष से अच्छा लाभ भी होगा। दुर्जन लोगों को संगति से बचें। मान-प्रतिष्ठा में मित्र वर्ग सहयोगी रहेंगे। मांगलिक कार्यों में वर्चस्व बढ़ेगा। विदेशी यात्रा या साहित्य सेवा सम्मान प्राप्ति का योग बनता है। नया कार्य भी होगा। 19, 22, 27 शुभदायक नहीं लगती हैं।
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मिथुन राशि- (क, की, कु, घ, ड़, छ, के, को, हा): देवगुरु बृहस्पति मनोरंजन के साधनों एवं भक्तिमय कार्यों में बढ़ोतरी करेंगे। कुछ विशेष स्थानों में मान-सम्मान की प्राप्त होगा। पैतृक संपत्ति विक्रय से लाभ का योग है। चुनाव कार्यों में विजय का संकेत बनता है। जिन लोगों ने नौकरी के लिए आवेदन किया है उनके लिए राजकीय सेवा का योग भी बनता है। वाहन क्रय तथा विक्रय दोनों योग लाभदायक हैं। 26, 29 अशुभ कारक हैं अतः आराधना-साधना में इन तिथियों का सदुपयोग करें।
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कर्क राशि- (ही, हु, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो) : यद्यपि गुरु बृहस्पति अनेक बाधाओं से बचाते रहेंगे फिर नेत्र विकार, शत्रु पक्ष से अशांतिदायक योग बनता है। संतान को रोजगार प्राप्ति होगी। स्त्री वर्ग की प्रेरणा से सामाजिक मान बढ़ेगा। मित्र वर्ग आपको सफलता दिलाने में तत्पर रहेंगे। वायु विकार का रोग होने का संकेत बनता है। 17, 25, 29 तारीखें अशुभ संकेत कर रही हैं।
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सिंह राशि- (मा, मी, बू, मे, मो, टा, टी, टू, टे): इस राशि के जातकों के लिए इन दिनों कार्यक्षेत्र में बढ़ोत्तरी का योग है। रचनात्मक कार्यों से मान-सम्मान भी बढ़ेगा। आर्थिक लाभ होगा साथ ही उद्योग धंधे में प्रगति होगी। जनचेतना संबंधी उपलब्धियाँ प्राप्त होंगी। रुका हुआ कार्य भी बनेगा। न्यायालय में विजय होंगे। पुत्र-पौत्रों के भाग्योदय का समय है। वाहन प्राप्ति का योग बनता है। धार्मिक कार्य भी होंगे। 14, 22, 26 तिथियाँ अशुभ है। अतः बृहस्पति के बीज मंत्र 'ऊँ ग्राँ ग्रीं ग्रों सः गुरवे नमः' का जाप करें।
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कन्या राशि- (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो): इस राशि वालों को दाम्पत्य जीवन में वैमनस्य पैदा होने के आसार हैं। अतः क्रोध एवं संवेगों पर संतुलन बनाए रखने के लिए शिव-शक्ति की आराधना करनी चाहिए। यात्रा कष्टदायी हो सकती है। इसलिए लंबी यात्राओं से बचें। उदर पीड़ा का योग बनता है। आर्थिक लाभ यथावत्‌ रहेगा। राजकीय कार्यों में सफलता के शुभ योग बनते हैं। 22, 27 अशुभ हैं। इन तिथियों में कोई नया कार्य शुरू न करें।
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तुला राशि- (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते): संतान पक्ष से खर्चा बढ़ेगा। वाहन प्राप्ति का योग बन रहा है। व्यापारिक तथा व्यावसायिक कार्यों के लिए काफी भागदौड़ चलेगी। शत्रु पक्ष कमजोर पड़ेगा। राजकीय कार्यों में बहुत लाभ मिलेगा। सामाजिक दायित्व बढ़ेगा। विवाह जैसे शुभ कार्यों में खर्चा तथा सेवा कार्यों में सहभागिता बनी रहेगी। 14, 22, 28 अशुभ संकेत करते हैं। कोई नया कार्य करने से पहले किसी जानकार से सलाह लेना ठीक रहेगा।
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वृश्चिक राशि- (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू): पारिवारिक कार्यों का दायित्व बढ़ेगा। भूमि एवं भवन संबंधी विवाद से सावधान रहें। आर्थिक दृष्टि से माह ठीक रहेगा। रचनात्मक गतिशीलता बढ़ेगी। रिश्तेदारों से सहयोग प्राप्त होगा। राजकीय कार्यों में सफलता के शुभ योग तथा विजय का योग बनता है। 22, 24 अशुभ कारक हैं। इन तिथियों में गाय को चारा खिलाने से ग्रह की कू्र दृष्टि से बचा जा सकता है।
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धनु राशि- (ये, यो, भा, भी, भू, धा, फा, ढ़ा, भे) : बृहस्पति विशेष प्रभावी बनकर इच्छित कार्यों में सफलता का योग बनाते हैं। किसी नए पर्यटन स्थान की शुभ यात्रा होगी। प्रतियोगिता परिणाम एवं मनोनयन कार्य में सफलता मिलेगी। जनसंपर्क बढ़ेगा। धार्मिक कार्यक्रमों का दायित्व बढ़ेगा। श्रमिक एवं किसान वर्ग के लिए लाभ के अवसर मिलेंगे। रोजगार प्राप्ति का शुभ योग बनता है। राजनैतिक लाभ भी मिलेगा। 23, 27 तिथियाँ प्रतिकूल हैं।
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मकर राशि- (भो, जा, जी, खी, खू, खे, खो, गा, गी): इस राशि वालों को कुछ नयापन तथा व्यवहारिकता का शुभ लाभ मिलेगा। इष्ट मित्रों के मिलन से सामाजिक कार्यों में काफी भागदौड़ रहेगी लेकिन संतोषजनक सफलता मिलेगी। रोजगार का लाभ प्राप्त होगा। विदेशी यात्रा या वाहन जलयान यात्रा का शुभ संकेत बनता है। कुछ आर्थिक स्थिति सुधारने के सूत्र हाथ लगेंगे। 22, 27 तिथियाँ अनुकूल नहीं हैं। अतः नया कार्य इन तिथियों में शुरू न करें तो ठीक रहेगा।
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कुंभ राशि- (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा): इस राशि के जातकों के लिए इन दिनों कार्यक्षेत्र में जिम्मेदारी ज्यादा बढ़ेगी। भागदौड़ का माहौल रहेगा। अतः वाहन चलाने में सतर्क और सावधान रहने की जरूरत है। भूमि एवं भवन संबंधी विवादों से बचें। सामाजिक परिवेश में नए आयाम के अवसर मिलेंगे। राष्ट्रीय कार्यक्रमों में अहम्‌ भूमिका के प्रभाव से सम्मान-प्राप्ति का योग भी है। वाहन से सावधान रहें तो ठीक रहेगा। 14, 24, 29 तिथियाँ अशुभ कारक बन रही हैं। अतः शिवार्चन एवं हनुमान जी की उपासना से इन तिथियों में अपना समय लगाए रखें।
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मीन राशि- (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, च, ची) : इस राशि वालों को कभी अवरोध तो कभी विरोध का सामना करना पड़ सकता है। संयम बरतना शुभदायक रहेगा। बृहस्पति अधूरे कार्य में पूर्णता का योग बना रहे हैं। क्रय-विक्रय में अपने विवेक को काम में लेवें। परिवार में हर्षोल्लास का माहौल बना रहेगा। पशु धन से भी लाभ का योग है। दिनांक 19 एवं 26 शुभ कारक नहीं हैं। अतः गुरु बृहस्पति के मंत्र का जाप एवं गौसेवा अशुभ को भी शुभदायक बना सकती है।
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शुक्र :

अपने जीवनसाथी को कष्ट देने, किसी भी प्रकार के गंदे वस्त्र पहनने, घर में गंदे एवं फटे पुराने वस्त्र रखने से शुभ-अशुभ फल देता है।

मेष राशि वृषभ राशि मिथुन राशि कर्क राशि सिंह राशि कन्या राशि तुला राशि वृश्चिक राशि धनु राशि मकर राशि कुंभ राशि मीन राशि

लग्न में शुक्र हो तो जातक दीर्घायु सुंदर, ऐश्वर्यवान, मधुर भाषी, भोगी, विलासी, प्रवासी और विद्वान होता है।
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दूसरे भाव शुक्र हो तो धनवान, यशस्वी, साहसी, कवि एवं भाग्यवान होता है।
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तीसरे भाव में शुक्र हो तो धनी, कृपण, आलसी, चित्रकार, पराक्रमी, विद्वान, भाग्यवान एवं पर्यटनशील होता है।
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चौथे भाव में शुक्र हो तो जातक बलवान, परोपकारी, आस्तिक, सुखी, भोगी, पुत्रवान एवं दीर्घायु होता है।
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पांचवें भाव में शुक्र हो तो सद्गुणी, न्यायप्रिय, आस्तिक, दानी, प्रतिभाशाली, वक्ता एवं व्यवसायी होता है।
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छठे भाव में शुक्र हो तो जातक स्त्री सुखहीन, बहुमित्रवान, दुराचारी, वैभवहीन एवं मितव्ययी होता है।
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सातवें भाव में शुक्र हो तो स्त्री से सुखी, उदार, लोकप्रिय, धनिक, विवाह के बाद भाग्योदयी, अल्पव्याभिचारी एवं विलासी होता है।
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आठवें भाव में शुक्र हो तो निर्दयी, रोगी, क्रोधी, ज्योतिषी, मनस्वी, पर्यटनशील एवं परस्त्रीरत होता है।
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नौवें भाव में शुक्र हो तो आस्तिक, गृहसुखी, प्रेमी, दयालु, तीर्थस्थानों की यात्रा करने वाला, राजप्रिय एवं धर्मात्मा होता है।
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दसवें भाव में शुक्र हो तो विलासी, ऐश्वर्यवान, न्यायवान, धार्मिक, गुणवान एवं दयालु होता है।
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ग्यारहवें भाव में शुक्र हो तो जातक विलासी, वाहनसुखी, स्थिर लक्ष्मीवान, परोपकारी, धनवान, कामी एवं पुत्रवान होता है।
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बारहवें भाव में शुक्र हो तो न्यायशील, आलसी, पतित, परस्त्रीरत, धनवान एवं मितव्ययी होता है।
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शनि :

ताऊ एवं चाचा से झगड़ा करने एवं किसी भी मेहनतम करने वाले व्यक्ति को कष्ट देने, अपशब्द कहने एवं इसी के साथ शराब, माँस खाने पीने से शनि देव अशुभ फल देते हैं। कुछ लोग मकान एवं दुकान किराये से लेने के बाद खाली नहीं करते अथवा उसके बदले पैसा माँगते हैं तो शनि अशुभ फल देने लगता है।
* शनि (Saturn), शनिवार के स्वामी है।
* शनि हिन्दू ज्योतिष में नौ मुख्य खगोलीय ग्रहों में से एक है।
* शनि की प्रकृति तमस है और कठिन मार्गीय शिक्षण, करियर और दीर्घायु को दर्शाता है।
* शनि शब्द की व्युत्पत्ति 'शनये क्रमति सः' से हुई अर्थात, वह जो धीरे-धीरे चलता है।
* शनि को सूर्य की परिक्रमा में 30 वर्ष लगते हैं।
* उनका चित्रण काले रंग में, एक तलवार, तीर और दो खंजर लिए हुए होता है और वे अक्सर एक काले कौए पर सवार होते हैं।

मेष राशि वृषभ राशि मिथुन राशि कर्क राशि सिंह राशि कन्या राशि तुला राशि वृश्चिक राशि धनु राशि मकर राशि कुंभ राशि मीन राशि

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लग्न में शनि मकर तथा तुला का हो तो जातक धनाढ्य, सुखी और अन्य राशियों का हो तो दरिद्रवान होता है।
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दूसरे भाव में हो तो कटुभाषी और कुंभ या तुला का शनि हो तो धनी, कुटुंब तथा भ्रातृवियोगी, लाभवान होता है।
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तीसरे भाव में हो तो निरोगी, योगी, विद्वान, चतुर, विवेकी, शत्रुहंता होता है।
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चौथे भाव में हो तो बलहीन, अपयशी, शीघ्रकोपी, धूर्त, भाग्यवान होता है।
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पांचवें भाव में हो तो वात रोगी, भ्रमणशील, विद्वान, उदासीन, संतानयुक्त एवं चंचल होता है।
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छठे भाव में शनि हो तो शत्रुहंता, कवि, भोगी, कंठ व श्वांस रोगी, जातिविरोधी होता है।
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सातवें भाव में हो तो क्रोधी, धनहीन, सुखहीन, भ्रमणशील, स्त्रीभक्त, विलासी एवं कामी होता है।
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आठवें भाव में हो तो कपटी, वाचाल, डरपोक, धूर्त एवं उदार प्रवृत्ति का होता है।
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नौवें भाव में हो तो प्रवासी, धर्मात्मा, साहसी, भ्रातृहीन एवं शत्रुनाशक होता है।
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दसवें भाव में हो तो नेता, न्यायी, विद्वान, ज्योतिषी, अधिकारी, महत्वाकांक्षी एवं धनवान होता है।
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ग्यारहवें भाव में हो तो दीर्घायु, क्रोधी, चंचल, शिल्पी, सुखी, योगी, पुत्रहीन एवं व्यवसायी होता है।
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बारहवें भाव में शनि हो तो जातक व्यसनी, दुष्ट, कटुभाषी, अविश्वासी, मातृ कष्टदायक, अल्पायु एवं आलसी होता है।
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राहु :

राहु सर्प का ही रूप है अत: सपेरे का दिल ‍दुखाने से, बड़े भाई को कष्ट देने से अथवा बड़े भाई का अपमान करने से, ननिहाल पक्ष वालों का अपमान करने से राहु अशुभ फल देता है।

मेष राशि वृषभ राशि मिथुन राशि कर्क राशि सिंह राशि कन्या राशि तुला राशि वृश्चिक राशि धनु राशि मकर राशि कुंभ राशि मीन राशि

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लग्न में राहु हो तो जातक दुष्ट, मस्तिष्क रोगी, स्वार्थी, राजद्वेषी, कामी एवं अल्पसंतति वाला होता है।
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दूसरे भाव में राहु हो तो परदेशगामी, अल्पसंतति, अल्प धनवान होता है।
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तीसरे भाव में राहु हो तो बलिष्ठ, विवेकयुक्त, प्रवासी, विद्वान एवं व्यवसायी होता है।
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चौथे भाव में हो तो असंतोषी, दुखी, मातृ क्लेशयुक्त, क्रूर, कपटी एवं व्यवसायी होता है।
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पांचवें भाव में हो तो उदर रोगी, मतिमंद, धनहीन, भाग्यवान एवं शास्त्र प्रिय होता है।
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छठे भाव में विधर्मियों द्वारा लाभ, निरोग, शत्रुहंता, कमर दर्द पीड़ित, अरिष्ट निवारक एवं पराक्रमी होता है।
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सातवें भाव में हो तो स्त्री नाशक, व्यापार में हानिदायक, भ्रमणशील, वातरोग जनक, लोभी एवं दुराचारी होता है।
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आठवें भाव में राहु हो तो पुष्टदेही, क्रोधी, व्यर्थ भाषी, उदर रोगी एवं कामी होता है।
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नौवें भाव में राहु हो तो प्रवासी, वात रोगी, व्यर्थ परिश्रमी, तीर्थाटनशील, भाग्यहीन एवं दुष्ट बुद्धि होता है।
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दसवें भाव में राहु हो तो आलसी, वाचाल, मितव्ययी, संततिक्लेशी तथा चंद्रमा से युत हो तो राजयोग कारक होता है।
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ग्यारहवें भाव में राहु हो तो मंदमति, लाभहीन, परिश्रमी, अल्प संततियुक्त, अरिष्ट नाशक एवं सफल कार्य करने वाला होता है।
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बारहवें भाव में राहु हो तो विवेकहीन, मतिमंद, मूर्ख, परिश्रमी, सेवक, व्ययी, चिंतनशील एवं कामी होता है। Go To List

केतु :

भतीजे एवं भांजे का दिल दुखाने एवं उनका हक ‍छीनने पर केतु अशुभ फल देना है। कुत्ते को मारने एवं किसी के द्वारा मरवाने पर, किसी भी मंदिर को तोड़ने अथवा ध्वजा नष्ट करने पर इसी के साथ ज्यादा कंजूसी करने पर केतु अशुभ फल देता है। किसी से धोखा करने व झूठी गवाही देने पर भी राहु-केतु अशुभ फल देते हैं।

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GRAH

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सूर्य चन्द्र मंगल बुध
बृहस्पति शुक्र शनि
राहू केतू

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